Gurudutt


गुरुदत्त (08 दिसम्बर, 1894 - 08 अप्रैल, 1989) हिन्दी के महान उपन्यासकार थे। वे पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक भी थे। विज्ञान के विद्यार्थी और पेशे से वैद्य होने के बावजूद वे बीसवीं शती के एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक थे जिन्होने लगभग दो सौ उपन्यास, संस्मरण, जीवनचरित, आदि का सृजन किया और भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, विज्ञान, राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में भी अनेक उल्लेखनीय शोध-कृतियाँ दीं।

इन्हें क्रांतिकारियों का गुरु कहा जाता है। जब ये लाहरुर के नेशनल कॉलेज में हेडमास्टर थे तो सरदार भगत सिंहसुखदेव व राजगुरु इनके सबसे प्रिय शिष्य थे, जो बाद में आजादी की जंग में फाँसी का फंदा चूमकर अमर हो गए।

अपने उपन्यासों के माध्यम से गुरुदत्त ने प्राचीन भारतीय संस्कृति, सभ्यता और धर्म की प्रशंसा की है और उसकी श्रेष्ठता स्थापित करने का यत्न किया है। वे काँग्रेसनेहरू और महात्मा गाँधी के कटु आलोचक थे। वे स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनन्य भक्त थे और आर्य समाज के पालने में पले-बढ़े लेखक-साहित्यकार थे।[1]

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी वैद्य गुरुदत्त ने अपना सम्पूर्ण साहित्य हिन्दी में लिखकर उसकी महती सेवा की है। वे हिन्दी साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र थे। अपनी अनूठी साधना के बल पर उन्होंने लगभग दो सौ उपन्यासों की रचना की और भारतीय संस्कृति का सरल एवं बोधगम्य भाषा में विवेचन किया। साहित्य के माध्यम से वेद-ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का उनका प्रयास निस्सन्देह सराहनीय रहा है।

उनके सभी उपन्यासों के कथानक अत्यन्त रोचक, भाषा अत्यन्त सरल और उद्देश्य मनोरंजन के साथ जन-शिक्षा है। राष्ट्रसंघ के साहित्य-संस्कृति संगठन ‘यूनेस्को’ के अनुसार श्री गुरुदत्त 1960-1970 के दशकों में हिंदी साहित्य में सर्वाधिक पढ़े जानेवाले लेखक रहे हैं।

Gurudutt was the novelist along with freedom fighter and social activist. He was great writer of 20th centuries besides of a science student and a doctor, who has written around two hundred novel, memoir and given many research material on Indian history, religion, philosophy, culture, science, politics and socialism.

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